आत्म युद्ध

आत्म युद्ध

बहुत सह लिए घाव समय के, जीवन के भी व्याप बहुत से;
समझौता नहीं, युद्ध की तू बात कर;
आगे बढ़ और प्रतिघात कर।।1।।

जो तेरा है, हैं वो अनुकंपा ईश्वर की;
ध्येय तेरा कर्म हो, और तू लक्ष ही बात कर;
आगे बढ़ और प्रतिघात कर।।2।।

ना भयभीत हो, मार्ग में जब हों घोर तम(अंधकार);
आंखे बंद कर, आत्मज्योती की रश्मि से स्वमार्ग प्रदीप्तमान कर;
आगे बढ़ और प्रतिघात कर।।3।।

तू ही तेरा प्रतिद्वंद्वी हैं, दूजा कोई और नहीं;
आत्म युद्ध को जीत ले, फिर विजयश्री गान कर;
आगे बढ़ और प्रतिघात कर।।4।।

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