निर्झर वृक्ष के झरते पात
कल बहार उसकी हर शाखा पर छाएंगी,
बांध झूला उसकी डाली पर,
स्वरबाला कोई फाग गीत भी गाएगी;
जो छोड़ गए है पंछी उसको,
वापस लौटकर, घरौंदा वहीं सजाएंगे;
हम भी चिलचिलाती धूप में,
उसकी शीतल छाव बिना मूल्य ही पाएंगे;
बस समर्पण का ही तो है, ध्येय उसका,
क्या हुआ यदि, वह है सह रहा,
हो मौन पतझड़ का हर उत्पात;
दुख होता है देखकर,
किसी निर्झर[1] वृक्ष के झरते पात[2]।।
- निर्झर – निस्सहाय, बेसहारा।
- पात – पत्ते।