मेरा एक घर है गांव में

मेरा एक घर है गांव में

यू दर दर भटकता, मुकद्दर की फ़िक्र करता
मुसाफिर हूं मैं इस शहर में, कभी वापस लौट जाऊंगा
सफर पर निकला हूं, अनजानों संग नाव में
आशियानो की फ़िक्र नहीं मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।1।।

हर ग़म से बेखबर था, मां के आंचल की जबतलक छाव थी
हाथ छूटते ही उसका, मुसीबतों से घिर गया मैं
खुले आसमान उड़ता था कभी, अब बेड़ियां हैं पांव में
पिंजरों में रहने की आदत नहीं मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।2।।

तनहा सा लगता हूं, इस शहर की भीड़ में
मेरे गांव का सन्नाटा भी, महफ़िल सा लगता था
खेलता मैदान में, आराम फरमाता कभी पिपल की छाव में
पर वक्त से शिकायत नहीं मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।3।।

कभी कबार घर जाता हूं, अब मैं शहर में रहता हूं
ख़ुशबू मेरे गांव की, मेरी शख्सियत से अंत तक आयेगी
ये आंखें जहां खुली, वहीं बंद होने की दुआ करता हूं
मंज़ूर नहीं गुमनाम मौत मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।4।।

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