हे नारी!
हे नारी! तुम शक्ति का अविरत – अविचल संसाधन हो।।
तुम अंबा, ज्वाला, माया और दुर्गा की अवतारी हो।
तुम समरनाद पांचजन्य का, अर्जुन की ललकारी हो।
तुम तांडव शिव का, त्रिनेत्र अग्नि प्रलयांकरी हो।।1।।
हे नारी!….
तुम शुल बाण का, सारंग की प्रत्यंचा हो।
तुम कौमौदकी[1] केशव की, तेज धार सुदर्शन हो।
संसार को जो ज्ञान दिया, जीवन सार अनंता[2] हो।।2।।
हे नारी!….
तुम शिव हो, अमृत त्याग जो हलाहल का पान करे।
तुम रणचंडी, जो रक्तबीज संहार रक्त का पान करे।
शक्ति को आव्हान हैं, खड़ग उठा पुनः रक्त पात करे।।3।।
हे नारी!….
शब्द, शक्ति का परिचय दे, उनमें इतना वेग कहा?
मैं लिखूंगा?, मुझमें काव्य विवेक कहा?
और शब्द कहा से लाऊ?, जिनसे जगजननी का परिचय हो।।4।।
हे नारी!….
हे भारत की नारी, जाग उठो अवतारी अब।
जो तुमको अबला समझे, बल का उनको परिचय दो।
किस पौरुष का बंधक बनती?, जब तुम पौरुष की जननी हो…(2)।।5।।
हे नारी! तुम शक्ति का अविरत – अविचल संसाधन हो।।
1- कौमौदकी, भगवान श्री कृष्ण की गदा
2- अनंता श्रीमद् भागवत गीता के अठारह नामो में से एक नाम।