जीवन-जलधि
चहूं ओर अंधकार, ना कहीं आस रश्मि।
खड़ा हूं मौन, बीच मझधार कश्ती।
हवा भी विरूद्ध, और है लहरों से युद्ध।
दूर है किनारा, बस टूटी पतवार का सहारा।
ना दीपस्तंभ, नाहीं आसपास कोई बसती।।
ना चन्द्र-चांदनी दिखते, रात पूनम जबकी।
सोलहवीं कला का अस्त चन्द्र, नाहीं शीतल किरण।
लगे दसो दिशा एक सम, घोर विस्मय।
जितना चलाऊ चप्पू, उतना ही घिरता जाऊ।
है यह जीवन-जलधि[1]?, या कोई दलदल छिछली?।।
ख़ैर मनाता, ना मैं करता विलाप फिर भी।
दिशा ही भुला हूं, गंतव्य है याद अब भी।
निशा यह भी छट जाएगी, जब भोर आयेगी।
मैं थका नहीं, नाही मैं निराश हूं।
जबतक हूं घिरा अंधकार से, तबतक ही मौन हूं।।
लो आयी नव प्रभा, लायी संग सहस्त्र रश्मि।
प्राची[2] में उदीप सूर्य, नव दिशा का ज्ञान दे गया।
लगा ऎसा, की कोई मुझे जीवन दान दे गया।
डूब कर पार जाने का हुनर सिखाया पतवार ने।
हवा ने बताया, तूफानों की बहुत कम है परिधी।
है विश्वास मुझे, मैं पार करूंगा जीवन-जलधि।।
है विश्वास मुझे, मैं पार करूंगा जीवन-जलधि।।
1. जलधि : समुद्र, सागर या दरिया।
2. प्राची : पर्व दिशा, पूरब।