कर्म युद्ध

कर्म युद्ध

हो समर का वीर तू, शुल तू, तलवार तू;
मध्य रण के आ जरा, समय को ललकार तू;
विपरीत हो परिस्थिति, या हो चाहें पूर्ण जगती[1];
तू डिगे नहीं, तू रुके नहीं, यही तेरा संकल्प हो;
हो तेरी ही विजय, समय की हार होनी चाहिएं;
यह समय रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।1।।

कर्म के युद्ध में, जब धर्म के तुम साथ हो;
कौरव कैसे जीते?, जब कृष्ण पार्थ के साथ हो;
तू शील[2] हो, तुझमें दया – क्षमा का भाव हो;
यदि तुम रथी नीति रथ के, सारथी स्वयं धर्म होगा;
कर्म युद्ध की बेला पर, शस्त्र शमी[3] से उतार लेने चाहिए;
यह नीति रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।2।।

जीना कबतक यू नेपथ्य[4] में, कभी तो रंगमंच भाग हो;
जीवन की नाटक का, तू भी कभी मुख्य किरदार हो;
कोई याद तुझे क्यों करेगा, मृत्यु का पर्दा जब भी गिरेगा;
कर्मो का हिसाब होगा, जब भी तुझे कृतांत[5] लेने आयेगा;
कर ऐसा अभिनव अभिनय, तेरी एक मिसाल होनी चाहिए;
यह जीवन रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।3।।

1) जगती : विश्व, संसार।
2) शील : विनम्र।
3) शमी : वृक्ष, जहां अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने शस्त्र छुपाए थे।
4) नेपथ्य : पर्दे के पीछे (backstage)।
5) कृतांत : यमदूत, यम इत्यादि।

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