मैं भूल जाऊंगा….
जिम्मेदारियां ही रास्ता सपनों का काट जाती है,
वरना, कोई तूफानों से लडने का जज़्बा लिए,
किनारों पर रेत का घर क्यो बनायेगा।।
हमारे ज़मीर से है रिश्ता उसका,
हमारा ही बदला है पता शायद,
दिल अब भी गाव के उसी घर में रहता हैं।।
मुझे शिक़ायत करनी थी,
की, आज खाना अच्छा नहीं बना,
फिर याद आया, यहां मां नहीं रहती।।
घर कब जाइएगा, की ये अब त्यौहार बताते हैं,
शुकर है, दिल की ज्यादा नहीं चलती,
वो राज़ी है, दिवाली हर महीने मनाने को।।
कोई पूछेगा अगर ऎ वक्त तेरे बारे में,
मैं सिर्फ तेरी अच्छाई बताऊंगा,
हर बुराई भूल जाऊंगा।।
तुझसे(वक्त) अपना बैर भी नहीं कोई,
थककर चूर, कुछ देर ही सही जब घर जाऊंगा,
मां के हाथो की चाय पीते ही,
मैं हर उदासी भूल जाऊंगा।।