अंतर-द्वंद
अंजान डगर, अंजान सफ़र;
ना खुद की, ना मंजिल की खबर।।
ना शब्द से शब्द मिलता, ना काफिया मिलता कहीं;
गैर मिलते हर मोड़ पे यहां, ना अपना मिला कोई।।
खुद को ढूंढू या खुदा को, समझ नहीं आता;
जमाने भर से मिलता हूं, खुद से मिल नहीं पाता।।
वो मेरे सपनों की राह न चली;
जिंदगी गज़ब की बेवफा निकली।।
गिरता, संभलता, लड़खड़ाता कभी;
सिख रहा हूं जीने का सबक जिंदगी से।।
खुद से शिकायत, खुद ही से शिकवा;
मेरा यह युद्ध, है मेरे ही विरूद्ध।।
निभा रहा मै, अलिखित अनुबंध[1];
मै और मेरा अंतर-द्वंद।।
1. अलिखित अनुबंध – Unwritten agreement