मां
मैं तव चरणन की रज (धूल) सा, तु जीवन का आधार है मां;
मैं दिशाहीन पतंग सा हूं, तु पूरब की हवा है मां।।
मेरी हर उपलब्धि, तेरा दिया आशीष है मां;
तू, मुझ पर ईश्वर की अनुकंपा सी;
मैं लिप्त घोर अन्धकार में, तु दिव्य-आलोक(दैवीय प्रकाश) है मां।।
तु व्यापक नभ सी, धरा सी धैर्यवान;
मैं मरुथल की तृष्णा सा, तु सरोवर का जल है मां;
मैं तपती दोपहरी सा, तु वटवृक्ष की शितल छाव है मां।।
तु ममत्व की अभिव्यक्ति, वात्सल्य का स्थायी भाव;
तु निर्वेद नदी सी, मैं अथा अशांत जलधार हूं मां;
मैं गुणहीन पत्थर सा हूं, तु मेरी शिल्पकार है मां।।