नववर्ष

नववर्ष

शुष्क पड़ी हो चहूं और धारा शेष,
ना बहर कहीं, ना उगते नव अंकुर विशेष,
आवरण में हो कहीं रती निः शेष,
मंद-मंद हो दिनमणि[1], पूर्ण ओज ना पाता हो,
धुंध-धुंध हो व्योम[2], स्पष्ट परिदृष्य नजर ना आता हो,
जब प्रकृति अपनी ही कलाओ में अस्त रहे,
तब किसबात का नववर्ष मनाते हो।।

अरे! नववर्ष तो तब हो,
जब बसंत द्वार पर आन मिले,
बहार पूर्ण यौवन पर हो,
तरुवर नव पात लिए, नवजीवन पा जाते हो,
आदित्य प्रखर हो गती करे, वसुधा में नवरंग भरे,
जब प्रकृति का नूतन रूप दिखाई देता है,
चैत्र मास के शुक्लपक्ष में,
असल नववर्ष मनाया जाता है।।

  1. दिनमणि, आदित्य: सूर्य।
  2. व्योम: आसमान।
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