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Author: Jayesh Raipure

तुम्हे बताए कैसे?

तुम्हे बताए कैसे?

अपनी ही चीजों पर हक जताए कैसे, तुमसे मोहब्बत है, तुम्हे बताए कैसे।। हर कोई देख रहा है, घिरे है हर तरफ से, इस महफिल में दिल की बात, तुम्हे बताए कैसे।। चोट जिस्म पर होती तो बता भी देते, दिल पर लगे घाव, तुम्हे बताए कैसे।। की आरज़ू तो अब भी रखते है, उन्हें पाने की, उन टूटे हुए सपनो कि दास्ता, तुम्हे बताए कैसे।। ये अकसर होता है, हम शब भर जागते है, क्या कारण है कि नींद…

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तुमको सूचित हो

तुमको सूचित हो

हर वक्त, हर किसी स्मरण में, एकांत में या, भीड़ भरे सदन में, चाहे रुका हुआ हूं, या फिर हूं चलन में, रहू पतझड़, या बासंती छुहन में, हर पत्र, हर चित्र-स्वयं में, मैं लिख रहा हूं, गीत सृजन के, तुमको सूचित हो।। हर रस, कहीं विरस पर, छोड़ सब छंद, कहीं अलंकार पर, बिन चौपाई, हर यमक पर, खुद के विस्मय, कभी विस्मृती पर, कभी कनु[1] तो, कभी कनुप्रिया[2] पर, मैं लिख रहा हूं, गीत प्रेम के, तुमको सूचित…

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वीरगति तक लड़ना होगा..

वीरगति तक लड़ना होगा..

रहो खड़े जीवन रण में, हो निर्भीक निडर, कर गर्जन गभीर, एक निर्मम हुंकार भरो, शर[1] रिक्त हो जब भी तूणीर, स्वयं का संधान करो, आत्मचिंतीत जीवन लक्ष्यों के भेदन का, ऎसा आत्मघाती, कोई तो उपाय करो।। है अभेद्य क़िले सा वह नर, जलती हो जिसमें, विजय की आग प्रखर, प्रस्फुटित[2] हो, जब भी उसका अंत:अनल[3], मचा देता है फिर वह भीषण गदर, बांध नहीं सकते तब उसे, कोई भी पाश प्रबल।। चुनौतियों से श्रृंगारित रणभूमि, तुम क्यो डर डर…

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नववर्ष

नववर्ष

शुष्क पड़ी हो चहूं और धारा शेष, ना बहर कहीं, ना उगते नव अंकुर विशेष, आवरण में हो कहीं रती निः शेष, मंद-मंद हो दिनमणि[1], पूर्ण ओज ना पाता हो, धुंध-धुंध हो व्योम[2], स्पष्ट परिदृष्य नजर ना आता हो, जब प्रकृति अपनी ही कलाओ में अस्त रहे, तब किसबात का नववर्ष मनाते हो।। अरे! नववर्ष तो तब हो, जब बसंत द्वार पर आन मिले, बहार पूर्ण यौवन पर हो, तरुवर नव पात लिए, नवजीवन पा जाते हो, आदित्य प्रखर हो…

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हे नारी!

हे नारी!

हे नारी! तुम शक्ति का अविरत – अविचल संसाधन हो।।तुम अंबा, ज्वाला, माया और दुर्गा की अवतारी हो।तुम समरनाद पांचजन्य का, अर्जुन की ललकारी हो।तुम तांडव शिव का, त्रिनेत्र अग्नि प्रलयांकरी हो।।1।।हे नारी!…. तुम शुल बाण का, सारंग की प्रत्यंचा हो।तुम कौमौदकी[1] केशव की, तेज धार सुदर्शन हो।संसार को जो ज्ञान दिया, जीवन सार अनंता[2] हो।।2।।हे नारी!…. तुम शिव हो, अमृत त्याग जो हलाहल का पान करे।तुम रणचंडी, जो रक्तबीज संहार रक्त का पान करे।शक्ति को आव्हान हैं, खड़ग उठा…

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