मां
मैं तव चरणन की रज (धूल) सा, तु जीवन का आधार है मां;मैं दिशाहीन पतंग सा हूं, तु पूरब की हवा है मां।। मेरी हर उपलब्धि, तेरा दिया आशीष है मां;तू, मुझ पर ईश्वर की अनुकंपा सी;मैं लिप्त घोर अन्धकार में, तु दिव्य-आलोक(दैवीय प्रकाश) है मां।। तु व्यापक नभ सी, धरा सी धैर्यवान;मैं मरुथल की तृष्णा सा, तु सरोवर का जल है मां;मैं तपती दोपहरी सा, तु वटवृक्ष की शितल छाव है मां।। तु ममत्व की अभिव्यक्ति, वात्सल्य का स्थायी…