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Author: Jayesh Raipure

मां

मां

मैं तव चरणन की रज (धूल) सा, तु जीवन का आधार है मां;मैं दिशाहीन पतंग सा हूं, तु पूरब की हवा है मां।। मेरी हर उपलब्धि, तेरा दिया आशीष है मां;तू, मुझ पर ईश्वर की अनुकंपा सी;मैं लिप्त घोर अन्धकार में, तु दिव्य-आलोक(दैवीय प्रकाश) है मां।। तु व्यापक नभ सी, धरा सी धैर्यवान;मैं मरुथल की तृष्णा सा, तु सरोवर का जल है मां;मैं तपती दोपहरी सा, तु वटवृक्ष की शितल छाव है मां।। तु ममत्व की अभिव्यक्ति, वात्सल्य का स्थायी…

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आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं

आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं

पहले कुछ गोरो ने, नंदनवन उजाड़ दिया;समृद्ध आर्यावर्त का, रत्नमुकुट उतार लिया;खींची लकीर, दामन भारत माता का फाड़ दिया;यह दुखद कथा है, सतलुज में लाशो के बहजाने की;युग-जननी की खंडित मुरत तुम्हें दिखाऊ;आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं||1|| वो कुछ ना खो कर भी, जो बलिदानी है;उनके वंशज आज, घनघोर अहंकारी है;जो बलिदानी प्राणो के, उन विरो का ना जय गान किया;चाटुकार कलमो ने, ना सच्चा इतिहास लिखा;तुम्हें असल इतिहास का राज़ बताऊ;आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं||2|| अब वह अपमानित अपने…

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युग-पुरुष भारत

युग-पुरुष भारत

सहस्त्र युगों का इतिहास अमर है,सभ्यता का यही प्रथम विस्तार हुआ,जन्मी संस्कृति इसी धरा में,वेदों का यही निर्माण हुआ,यह महाकाल का तांडव है, कोई नृत्य नहीं,युग-पुरुष है, भारत कोई भूखंड नहीं।। ये कोई संजोग नहीं,हा यही राम – कृष्ण अवतार हुए,आज जिस बोध को जग है ढूंढ रहा,यही बुद्ध को आत्मबोधी ज्ञान हुआ,सबकुछ त्याग जिन्होंने अहिंसा का मार्ग दिया,वह केवल ज्ञानी यही वर्धमान हुए,प्रभु भक्ति का दिव्य उदाहरण,यही राम भक्त हनुमान हुए।। हम चरक, हमने आयुर्वेद दिया,सुश्रुत बन, शल्य चिकित्सा…

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अश्वमेध यज्ञ

अश्वमेध यज्ञ

भरो उड़ान, की ये आसमान तुम्हारा है,करो सृजन, हर साधन तुम्हारा है,इच्छित गंतव्य का, पथ घोर कठीन है,लड़ो, की अब ये संघर्ष तुम्हारा है।।1।। क्षितिज को छुना है, नक्षत्र तोड़ लाने है,यही तो बस प्रण तुम्हारा है,क्या भला, क्या बुरा सब बीत जाएगा,उम्मीद रखो, की आने वाला यह वक्त तुम्हारा है।।2।। बिन विफलता, क्या सफलता?,यदी मनोबल, शीखर सम ऊंचा तुम्हारा है,प्रयत्न जारी बस तुम रखो,वो रात तुम्हारी थी, ये दिन भी तुम्हरा है।।3।। अविरत चलना, गुण धारा का,यह गुण धरो,…

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अर्जुन शस्त्र उठाओ

अर्जुन शस्त्र उठाओ

महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने शस्त्र त्याग कर युद्ध ना करने का निर्णय लिया, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें पुनः युद्ध के लिए सज्ज करने हेतु क्या कहा होगा, उसी पार्श्वभूमी पर लिखी गई कविता “अर्जुन शस्त्र उठाओ….” हो धीर, धर धनु धनंजय[1];उठा बाण, कर संधान लक्ष्य पर,मत भूल जो आघात हुए तव वक्ष पर,इन अपनों में, गैरो को पहचानो,लाक्षागृह की षड्यंत्रकारी आग ना भूलो,अर्जुन शस्त्र उठाओ।। द्यूत क्रीड़ा[2] में पासो का पक्षपात,दुर्योधन का वह अहंकारी हास,अंगराज(कर्ण)…

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