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Author: Jayesh Raipure

यह देश हम सबका है..

यह देश हम सबका है..

तुम्हारे इस उत्पात में,तुम्हारा अज्ञान, तम, राजनैतिक स्वार्थ,सब समाहित है,तुम्हारे इस राष्ट्र – द्वेष में,तुम्हारा ही अहित समाहित है।।1।। किस बात का दंभ तुम्हे,व्यर्थ ही का है घमंड तुम्हे,मिले समय तो, इतिहास का दर्पण देखो,अपने जग – उपेक्षित पूर्वजों का ध्यान करो,जिस भूमि ने आश्रय दिया, उसका तो लिहाज करो।।2।। सरहद पार से आए आदेशो का,शब्दशः अनुपालन जो करते,इंकलाब के नारों पर, जो झंडा पाक का फैराते,इस फूलों की बगिया में, येसे बबूल ना फलने देगे,संघर्ष तो बस इसी बात…

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मेरा एक घर है गांव में

मेरा एक घर है गांव में

यू दर दर भटकता, मुकद्दर की फ़िक्र करतामुसाफिर हूं मैं इस शहर में, कभी वापस लौट जाऊंगासफर पर निकला हूं, अनजानों संग नाव मेंआशियानो की फ़िक्र नहीं मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।1।। हर ग़म से बेखबर था, मां के आंचल की जबतलक छाव थीहाथ छूटते ही उसका, मुसीबतों से घिर गया मैंखुले आसमान उड़ता था कभी, अब बेड़ियां हैं पांव मेंपिंजरों में रहने की आदत नहीं मुझे, मेरा एक घर है गांव में।।2।। तनहा सा लगता हूं, इस…

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कागज़ के फूल

कागज़ के फूल

अब हमे मोहब्बत नहीं किसी से,किसी का हो जाने की आरज़ू तक नहीं;गमलों में बोए थे हमने, उनके दिए फूल,भूल थी, कि खिलते नहीं कभी कागज़ के फूल।। बड़ी मेहनत से गुलिस्ता सजाया हमने,हिफाजत में बगिया की, पतझड़ से भी लड़े;उन्होंने तौफे में मांगा भी तो क्या?, सिर्फ गुल;हिस्से हमारे आये उजड़ा हुआ गुलिस्तां और कागज़ के फूल।। यू बिखरे की फिर संभाले नहीं कभी,इश्क़ खता का मलाल रहा मर के भी;वो मिलने आए, जब कब्र पर हमारी जम चूकी…

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अंतर-द्वंद

अंतर-द्वंद

अंजान डगर, अंजान सफ़र;ना खुद की, ना मंजिल की खबर।। ना शब्द से शब्द मिलता, ना काफिया मिलता कहीं;गैर मिलते हर मोड़ पे यहां, ना अपना मिला कोई।। खुद को ढूंढू या खुदा को, समझ नहीं आता;जमाने भर से मिलता हूं, खुद से मिल नहीं पाता।। वो मेरे सपनों की राह न चली;जिंदगी गज़ब की बेवफा निकली।। गिरता, संभलता, लड़खड़ाता कभी;सिख रहा हूं जीने का सबक जिंदगी से।। खुद से शिकायत, खुद ही से शिकवा;मेरा यह युद्ध, है मेरे ही…

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एक बार फिर से प्रतिशोध चाहता है देश

एक बार फिर से प्रतिशोध चाहता है देश

विकट हैं वक्त, विलाप कर रही मां भारतीअपनों के विच्छेदित शव समेट रहा है देशमातृ भूमि के विरो संग न्याय होना चाहिएहर एक शहादत का हिसाब चाहता है देशएक बार फिर से प्रतिशोध चाहता है देश।।1।। साबुत गए थे जो, खंड विखंड हो आऐ हैंक्षित विक्षित पुत्र का अंतिम दर्शन चाहती हैं मांचलना सिखाया जिसे, उसिकी अर्थी को कंधा दे रहा पिताशत्रुओ के घर भी मातम चाहता है देशएक बार फिर से प्रतिशोध चाहता है देश।।2।। उजड़ी हुई मांगो का,…

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