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Category: हिंदी कविता

नववर्ष

नववर्ष

शुष्क पड़ी हो चहूं और धारा शेष, ना बहर कहीं, ना उगते नव अंकुर विशेष, आवरण में हो कहीं रती निः शेष, मंद-मंद हो दिनमणि[1], पूर्ण ओज ना पाता हो, धुंध-धुंध हो व्योम[2], स्पष्ट परिदृष्य नजर ना आता हो, जब प्रकृति अपनी ही कलाओ में अस्त रहे, तब किसबात का नववर्ष मनाते हो।। अरे! नववर्ष तो तब हो, जब बसंत द्वार पर आन मिले, बहार पूर्ण यौवन पर हो, तरुवर नव पात लिए, नवजीवन पा जाते हो, आदित्य प्रखर हो…

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हे नारी!

हे नारी!

हे नारी! तुम शक्ति का अविरत – अविचल संसाधन हो।।तुम अंबा, ज्वाला, माया और दुर्गा की अवतारी हो।तुम समरनाद पांचजन्य का, अर्जुन की ललकारी हो।तुम तांडव शिव का, त्रिनेत्र अग्नि प्रलयांकरी हो।।1।।हे नारी!…. तुम शुल बाण का, सारंग की प्रत्यंचा हो।तुम कौमौदकी[1] केशव की, तेज धार सुदर्शन हो।संसार को जो ज्ञान दिया, जीवन सार अनंता[2] हो।।2।।हे नारी!…. तुम शिव हो, अमृत त्याग जो हलाहल का पान करे।तुम रणचंडी, जो रक्तबीज संहार रक्त का पान करे।शक्ति को आव्हान हैं, खड़ग उठा…

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मां

मां

मैं तव चरणन की रज (धूल) सा, तु जीवन का आधार है मां;मैं दिशाहीन पतंग सा हूं, तु पूरब की हवा है मां।। मेरी हर उपलब्धि, तेरा दिया आशीष है मां;तू, मुझ पर ईश्वर की अनुकंपा सी;मैं लिप्त घोर अन्धकार में, तु दिव्य-आलोक(दैवीय प्रकाश) है मां।। तु व्यापक नभ सी, धरा सी धैर्यवान;मैं मरुथल की तृष्णा सा, तु सरोवर का जल है मां;मैं तपती दोपहरी सा, तु वटवृक्ष की शितल छाव है मां।। तु ममत्व की अभिव्यक्ति, वात्सल्य का स्थायी…

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आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं

आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं

पहले कुछ गोरो ने, नंदनवन उजाड़ दिया;समृद्ध आर्यावर्त का, रत्नमुकुट उतार लिया;खींची लकीर, दामन भारत माता का फाड़ दिया;यह दुखद कथा है, सतलुज में लाशो के बहजाने की;युग-जननी की खंडित मुरत तुम्हें दिखाऊ;आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं||1|| वो कुछ ना खो कर भी, जो बलिदानी है;उनके वंशज आज, घनघोर अहंकारी है;जो बलिदानी प्राणो के, उन विरो का ना जय गान किया;चाटुकार कलमो ने, ना सच्चा इतिहास लिखा;तुम्हें असल इतिहास का राज़ बताऊ;आओ! मातृ-भूमि की व्यथा सुनाऊं||2|| अब वह अपमानित अपने…

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युग-पुरुष भारत

युग-पुरुष भारत

सहस्त्र युगों का इतिहास अमर है,सभ्यता का यही प्रथम विस्तार हुआ,जन्मी संस्कृति इसी धरा में,वेदों का यही निर्माण हुआ,यह महाकाल का तांडव है, कोई नृत्य नहीं,युग-पुरुष है, भारत कोई भूखंड नहीं।। ये कोई संजोग नहीं,हा यही राम – कृष्ण अवतार हुए,आज जिस बोध को जग है ढूंढ रहा,यही बुद्ध को आत्मबोधी ज्ञान हुआ,सबकुछ त्याग जिन्होंने अहिंसा का मार्ग दिया,वह केवल ज्ञानी यही वर्धमान हुए,प्रभु भक्ति का दिव्य उदाहरण,यही राम भक्त हनुमान हुए।। हम चरक, हमने आयुर्वेद दिया,सुश्रुत बन, शल्य चिकित्सा…

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