कर्म युद्ध
हो समर का वीर तू, शुल तू, तलवार तू;मध्य रण के आ जरा, समय को ललकार तू;विपरीत हो परिस्थिति, या हो चाहें पूर्ण जगती[1];तू डिगे नहीं, तू रुके नहीं, यही तेरा संकल्प हो;हो तेरी ही विजय, समय की हार होनी चाहिएं;यह समय रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।1।। कर्म के युद्ध में, जब धर्म के तुम साथ हो;कौरव कैसे जीते?, जब कृष्ण पार्थ के साथ हो;तू शील[2] हो, तुझमें दया – क्षमा का भाव हो;यदि तुम रथी नीति रथ…