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Category: प्रेरक

बे मंज़िल सफ़र

बे मंज़िल सफ़र

अकेला नहीं राह में, मेरे सपने हमसफ़र हैं,बे मंज़िल ही सफर सही, पर राह मै भटका नहीं,मुसाफ़िर मिलते है बहुत, हमसफ़र नहीं मिलते,बिन हमसफ़र का, बे मंज़िल सफर है।। मेरे रास्ते जुदा है, मेरी चाहत से,मैं चलता जा रहा, अनसुनी आहट से,जिंदगी का दोराहा है मिलता, राह नहीं मिलती,बिन राह का, बे मंज़िल सफर हैं।। बे राह, बे हमसफ़र, बिन मंज़िल सही मेरा सफर,मैं अकेले चलूंगा, अंत तक चलूंगा,ना मिले मंज़िल लाख सही, पर मैं एक दिन खुद से मिलूंगा,खुद…

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कर्म युद्ध

कर्म युद्ध

हो समर का वीर तू, शुल तू, तलवार तू;मध्य रण के आ जरा, समय को ललकार तू;विपरीत हो परिस्थिति, या हो चाहें पूर्ण जगती[1];तू डिगे नहीं, तू रुके नहीं, यही तेरा संकल्प हो;हो तेरी ही विजय, समय की हार होनी चाहिएं;यह समय रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।1।। कर्म के युद्ध में, जब धर्म के तुम साथ हो;कौरव कैसे जीते?, जब कृष्ण पार्थ के साथ हो;तू शील[2] हो, तुझमें दया – क्षमा का भाव हो;यदि तुम रथी नीति रथ…

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जीवन-जलधि

जीवन-जलधि

चहूं ओर अंधकार, ना कहीं आस रश्मि।खड़ा हूं मौन, बीच मझधार कश्ती।हवा भी विरूद्ध, और है लहरों से युद्ध।दूर है किनारा, बस टूटी पतवार का सहारा।ना दीपस्तंभ, नाहीं आसपास कोई बसती।। ना चन्द्र-चांदनी दिखते, रात पूनम जबकी।सोलहवीं कला का अस्त चन्द्र, नाहीं शीतल किरण।लगे दसो दिशा एक सम, घोर विस्मय।जितना चलाऊ चप्पू, उतना ही घिरता जाऊ।है यह जीवन-जलधि[1]?, या कोई दलदल छिछली?।। ख़ैर मनाता, ना मैं करता विलाप फिर भी।दिशा ही भुला हूं, गंतव्य है याद अब भी।निशा यह भी…

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जरूरी है….

जरूरी है….

कुछ पड़ाव पार हुए, अभी रास्ता लम्बा बाकी है,चलने का हुनर भी चाहिए, दौड़ने के लिए,उड़ान भरने को, और कुछ मील दौड़ना भी जरूरी है।। वो खुशनसीब है, सफ़र जिनका मुकम्मल हुआ,हम तो आज भी सही, राह की फिराक में है,ऐसा नहीं कि मेहनत नहीं की हमने,मिज़ाज वक्त का देख ये लगा, की एक और कोशिश जरूरी है।। बहुत कुछ लिख चुका हूं, बहुत कुछ बाक़ी है,आरज़ू है सबकुछ लिखने की, लिख भी दू मगर,कुछ बेहतर लिखने को, अल्फ़ाज़ भी…

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तब, मैंने लिखें गीत कई

तब, मैंने लिखें गीत कई

भरे रंग बहारो ने,खिली बगिया जब पतझड़ बाद कई,केवल सृजन था, ना प्रलय कहीं,जब मैंने पाए गैरो में मीत कहीं,तब, मैंने लिखें गीत कई।।1।। शोहरत ना थी, ठीक सही,पर हर अपना साथ हमारे था,सबकुछ खो कर भी,था जब मैं निस्वार्थ खड़ा,तब, मैंने लिखें गीत कई।।2।। ना टिस हृदय में, ना कसक कहीं,भुलाकर हर किस्सा, लिखी है अब ग़ज़ल नई,अपना ना सही, पर औरों का,जब देखा होते, सफल प्रेम कहीं,तब, मैंने लिखें गीत कई।।3।। जमाना गम औरों के बाटे ना,अब तो…

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