तब, मैंने मिटाएं लिखकर गीत कई
लिखें थे अंतर्मन के छंद कई, द्वंद कई,कुछ सृजन के, कुछ प्रलय के अनुभव कई,कहीं प्रेम, था नीरस कहीं, तब कहीं रसपुर्ण विरह सही,यू ढूंढ़ कर भी ना मिले, अपनों में जब मीत कहीं,तब, मैंने मिटाएं लिखकर गीत कई।। कुछ पाने का कहा स्वार्थ था,ना भय कुछ खोने का था,फिर भी जो पाया, वो अपने श्रम से था,सब अर्जित कर भी, जब खुद को पाया एकांकी,तब, मैंने मिटाएं लिखकर गीत कई।। आवेग शून्य था,जब शब्दों का मुझको था ज्ञान नहीं,वो…