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Category: हिंदी कविता

हालात-ऐ-वतन सुधर जाएंगे

हालात-ऐ-वतन सुधर जाएंगे

अब यही रुकेंगे, और खैर मनाएंगे; बंद है रास्ते हर तरफ, बताओ कहा जाएंगे? गनीमत है, हमारे अपने है इस शहर में; मगर जो बेघर है, सोचो वो गरीब कहा जाएंगे? खुशनसीब हो दोस्त, एक घर है तुम्हरा; ये पेड़ जो टूटा, तो पंछी कहा जाएंगे? घर ने बुलाया भी हमको, पर हम नही लौटे; भरम में थे, की हालात-ऐ-शहर सुधर जाएंगे।। हमे लेकर फिकरमंद ना होना, हम सलामत है; पाबंदियों हटते ही, कुछ दिनो के लिए घर लौट आएंगे।।…

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मेरी कलम

मेरी कलम

वो खुद लयबद्ध रह कर, मुझे शब्दबद्ध करती, अपने बारे ने कुछ ना बताती, मेरे हर राज़ जगभर कहती।। मेरी ढाल बनती, बनती तलवार कभी, मेरा ही मुझपर लुटती, वो प्यार कभी, चन्द्र सी शीत, सूर्य सी ओज कभी, तारको सी श्वेत, प्रदिप्त कभी।। एक रोशनी, मेरे अंतर का अंधकार मिटाती, मुझे सही राह दिखाती, हसीन हुस्न कहा कोई, जो हम से दिल लगाए, कलम है मेरी, जो मुझपर प्यार लुटाए।।

निर्झर वृक्ष के झरते पात

निर्झर वृक्ष के झरते पात

कल बहार उसकी हर शाखा पर छाएंगी,बांध झूला उसकी डाली पर,स्वरबाला कोई फाग गीत भी गाएगी; जो छोड़ गए है पंछी उसको,वापस लौटकर, घरौंदा वहीं सजाएंगे; हम भी चिलचिलाती धूप में,उसकी शीतल छाव बिना मूल्य ही पाएंगे; बस समर्पण का ही तो है, ध्येय उसका,क्या हुआ यदि, वह है सह रहा,हो मौन पतझड़ का हर उत्पात; दुख होता है देखकर,किसी निर्झर[1] वृक्ष के झरते पात[2]।। निर्झर – निस्सहाय, बेसहारा। पात – पत्ते।

तुमको सूचित हो

तुमको सूचित हो

हर वक्त, हर किसी स्मरण में, एकांत में या, भीड़ भरे सदन में, चाहे रुका हुआ हूं, या फिर हूं चलन में, रहू पतझड़, या बासंती छुहन में, हर पत्र, हर चित्र-स्वयं में, मैं लिख रहा हूं, गीत सृजन के, तुमको सूचित हो।। हर रस, कहीं विरस पर, छोड़ सब छंद, कहीं अलंकार पर, बिन चौपाई, हर यमक पर, खुद के विस्मय, कभी विस्मृती पर, कभी कनु[1] तो, कभी कनुप्रिया[2] पर, मैं लिख रहा हूं, गीत प्रेम के, तुमको सूचित…

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वीरगति तक लड़ना होगा..

वीरगति तक लड़ना होगा..

रहो खड़े जीवन रण में, हो निर्भीक निडर, कर गर्जन गभीर, एक निर्मम हुंकार भरो, शर[1] रिक्त हो जब भी तूणीर, स्वयं का संधान करो, आत्मचिंतीत जीवन लक्ष्यों के भेदन का, ऎसा आत्मघाती, कोई तो उपाय करो।। है अभेद्य क़िले सा वह नर, जलती हो जिसमें, विजय की आग प्रखर, प्रस्फुटित[2] हो, जब भी उसका अंत:अनल[3], मचा देता है फिर वह भीषण गदर, बांध नहीं सकते तब उसे, कोई भी पाश प्रबल।। चुनौतियों से श्रृंगारित रणभूमि, तुम क्यो डर डर…

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