कर्म युद्ध

कर्म युद्ध

हो समर का वीर तू, शुल तू, तलवार तू;मध्य रण के आ जरा, समय को ललकार तू;विपरीत हो परिस्थिति, या हो चाहें पूर्ण जगती[1];तू डिगे नहीं, तू रुके नहीं, यही तेरा संकल्प हो;हो तेरी ही विजय, समय की हार होनी चाहिएं;यह समय रहे ना रहे, तेरा अस्तित्व रहना चाहिए।।1।। कर्म के युद्ध में, जब धर्म के तुम साथ हो;कौरव कैसे जीते?, जब कृष्ण पार्थ के साथ हो;तू शील[2] हो, तुझमें दया – क्षमा का भाव हो;यदि तुम रथी नीति रथ…

Read More Read More

जीवन-जलधि

जीवन-जलधि

चहूं ओर अंधकार, ना कहीं आस रश्मि।खड़ा हूं मौन, बीच मझधार कश्ती।हवा भी विरूद्ध, और है लहरों से युद्ध।दूर है किनारा, बस टूटी पतवार का सहारा।ना दीपस्तंभ, नाहीं आसपास कोई बसती।। ना चन्द्र-चांदनी दिखते, रात पूनम जबकी।सोलहवीं कला का अस्त चन्द्र, नाहीं शीतल किरण।लगे दसो दिशा एक सम, घोर विस्मय।जितना चलाऊ चप्पू, उतना ही घिरता जाऊ।है यह जीवन-जलधि[1]?, या कोई दलदल छिछली?।। ख़ैर मनाता, ना मैं करता विलाप फिर भी।दिशा ही भुला हूं, गंतव्य है याद अब भी।निशा यह भी…

Read More Read More

बस एक हम ही नहीं थे….

बस एक हम ही नहीं थे….

ढलती हुई शाम, जलती हुई शमा भी थी;नूर था चांद का, और थी चांदनी भी;सभी को बुलाया गया, हर कोई मौजुद था;बस एक हम ही नहीं थे, महफ़िल में उनके।।1।। हुई मोहब्बत सिर्फ, पर ना इजहार हुआ;ना उसने याद किया, और ना भुलाया हमने भी;हर गैर को दिल में जगह दी उन्होंने;बस एक हम ही नहीं थे, दिल में उनके।।2।। हम खुश है, की अब और रुसवाई नहीं होगी;थक ग‌‌‍‌‍ऎ, अब ना फिर मोहब्बत होगी;नसीब ने बहुत कुछ दिया उनको;बस…

Read More Read More

जरूरी है….

जरूरी है….

कुछ पड़ाव पार हुए, अभी रास्ता लम्बा बाकी है,चलने का हुनर भी चाहिए, दौड़ने के लिए,उड़ान भरने को, और कुछ मील दौड़ना भी जरूरी है।। वो खुशनसीब है, सफ़र जिनका मुकम्मल हुआ,हम तो आज भी सही, राह की फिराक में है,ऐसा नहीं कि मेहनत नहीं की हमने,मिज़ाज वक्त का देख ये लगा, की एक और कोशिश जरूरी है।। बहुत कुछ लिख चुका हूं, बहुत कुछ बाक़ी है,आरज़ू है सबकुछ लिखने की, लिख भी दू मगर,कुछ बेहतर लिखने को, अल्फ़ाज़ भी…

Read More Read More

ना मै तब रोया, ना अब रोया..

ना मै तब रोया, ना अब रोया..

पट पड़ी है भोर द्वार पर, पथ सारे उजले;रविकिरण से सौरभ सौरभ, यह नभ थल;तव स्मृतिपुर्ण थी बीती रजनी,ना मैं तब सोया, ना अब सोया।। अब यहां बाग़ फूलों से खिल उठे है,पंछी मधुर चहचहाते है,वीरान था ये मोड़ कभी, मै जहां तेरे प्रतीक्षा में रहा,ना तुम तब आयी, ना अब आयी।। मैं सब कुछ पा गया, एक तुझे छोड़कर,अब हर महफ़िल मेरी बात करे,कुछ दुख तो था तेरे जाने का,पर ना मै तब रोया, ना अब रोया।।